बाहर देखते अवाक
ढल रहा है सूर्य
सब दुरुस्त
जो नहीं वो होगा ठीक
क्षितिज के पार
कोई जानता है तकते उन्हें
दूर से सलाम कहता एक दोस्त
फिर ढल रहा है सूर्य
सैंकड़ों बार दिखता ये दृश्य
देर से भटका कोई परिंदा
लौट पाता घर
कुछ देर में
उनकी पलकें हो जाएंगी भारी
गिरते सिर
रात्रि से पाएंगे पार
सब जो उनके सोने पर लेगा अंगड़ाई
कभी नहीं जानेगा सूर्य
समर्थ वाशिष्ठ
________
पहल 82, 2006
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Thursday
प्रवास में याद: दो प्रेम कविताएं
1
मैंने जाना नहीं तुम्हें
जब थीं सोलह की
और ढूढ़ता रहा बरसों
तुम्हारे चेहरे पर उस उम्र का तेज।
तुमने खोदा मुझे बचपन से अचानक
और सींचा, ढाला, बनाया
अपने लिए
चुपचाप।
2
तुम कभी नहीं जान पाओ शायद
मैं कैसे जिया तुम्हारे बगैर
इकलौती आरामकुर्सी रही खाती हिचकोले
रोशनदान को तरसते कमरे के बीचोंबीच
जैसे मां ढके रही मेरे जुर्म-दोष बरसों-बरस
जूठे बर्तनों पर औंधी पड़ी रही तश्तरियां
बहुत कुछ ज़ाया गया शहर की नालियों में
जो लगना था कभी मेरे अंग
बहुत कुछ ख़ाक़ गया पकते वक़्त
जो कल्पना में रहा सुगंधों से भरपूर
सुबहों में सीढ़ियां बस उतरी हीं उतरी हीं
बिखरी रही मैली कमीज़ें हर ओर
खाली राशन डिब्बों से परेशान कमरा मेरा
सहेजे रहा मेरे दुर्गुणों को हर छोर
कि तुम आओ और चिल्ला सको बेधड़क
कि क्या मचा रक्खा है ये सब?
समर्थ वाशिष्ठ
___________
समकालीन भारतीय साहित्य, 2008
मैंने जाना नहीं तुम्हें
जब थीं सोलह की
और ढूढ़ता रहा बरसों
तुम्हारे चेहरे पर उस उम्र का तेज।
तुमने खोदा मुझे बचपन से अचानक
और सींचा, ढाला, बनाया
अपने लिए
चुपचाप।
2
तुम कभी नहीं जान पाओ शायद
मैं कैसे जिया तुम्हारे बगैर
इकलौती आरामकुर्सी रही खाती हिचकोले
रोशनदान को तरसते कमरे के बीचोंबीच
जैसे मां ढके रही मेरे जुर्म-दोष बरसों-बरस
जूठे बर्तनों पर औंधी पड़ी रही तश्तरियां
बहुत कुछ ज़ाया गया शहर की नालियों में
जो लगना था कभी मेरे अंग
बहुत कुछ ख़ाक़ गया पकते वक़्त
जो कल्पना में रहा सुगंधों से भरपूर
सुबहों में सीढ़ियां बस उतरी हीं उतरी हीं
बिखरी रही मैली कमीज़ें हर ओर
खाली राशन डिब्बों से परेशान कमरा मेरा
सहेजे रहा मेरे दुर्गुणों को हर छोर
कि तुम आओ और चिल्ला सको बेधड़क
कि क्या मचा रक्खा है ये सब?
समर्थ वाशिष्ठ
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समकालीन भारतीय साहित्य, 2008
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